ऊंची उड़ान के लिए बसें हैं जरूरी

6 September 2026

Also published in Jagriti Times 9 Sep 2026, and Nav Bihar Times 10 Sep 2026

भारत में आमजन आवागमन के लिए सबसे ज़्यादा किस साधन का इस्तेमाल करते हैं? हमारे देश में आमजन की सवारी है बस। हवाई जहाज हर जगह नहीं पहुंचता, बसें गांव-गांव तक जाती हैं।

हम हर जगह एयरपोर्ट बनाते हैं, और इसमें दिलचस्‍प बात तो यह है कि एयरपोर्ट उनलोगों के लिए है, जो ज़्यादा इनकम टैक्स भरते हैं, और जो लोग नहीं भरते उनके लिए यह एक रोजगार योजना है कि वे एयरपोर्ट पर काम करेंगे। लेकिन गांव से रोजगार के लिए शहर आने वाले कामगार जब अपने घर लौटते हैं या अपने रिश्‍तेदारों से मिलने गांव जाते हैं, तब उन्‍हें अपनी यात्रा के लिए ट्रेन या फिर लास्ट माइल तक बस का ही इस्तेमाल करना पड़ता है। इन सबके बावजूद हमारे बस नेटवर्क की व्यवस्था इतनी दयनीय क्यों है?

बस आएगी, नहीं आएगी, कब पहुंचेगी, महिलाओं के लिए रास्‍ते में शौचालय की व्यवस्था होगी कि नहीं, ये सवाल आम हैं। हाईवे पर रास्‍ते में कई जगह मिडवे होटल और बस अड्डे बन जाते हैं। जहां बहुत सारी दुकानें होती हैं, कुछ व्यवस्थाएं भी होती हैं, परन्‍तु ये सुविधाएं हर जगह स्‍तरीय नहीें होती हैं।

हाल ही में पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी (परिवहन, पर्यटन और संस्‍कृति) की रिपोर्ट आई है, जिसमें हमारी बस व्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव हैं। इनपर मैं अपने विचार व्‍यक्‍त करना चाहूंगा।

हवाई जहाज़ों के लिए एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया है, जो टर्मिनल बनाती है और उन टर्मिनल्स का इस्तेमाल कोई भी कर सकता है। बसों के लिए ऐसा कुछ नहीं है। राज्‍य सरकारें खुद बस चलाती हैं, उनके लिए टर्मिनल बनाती हैं, लेकिन प्राइवेट ऑपरेटर से साझा नहीं करतीं। यहां उल्‍लेखनीय है कि प्राइवेट ऑपरेटर सरकारी कंपनियों से ज्‍यादा बसें चलाते हैं और उनकी संख्‍या बढ़ती ही जा रही है।

सैद्धांतिक रूप से सरकार को ऐसी परियोजनाओं पर ध्‍यान देना चाहिए, जिनसे सामाजिक और आर्थिक विकास की नीेंव बने। मसलन आप बस टर्मिनल बनाइए, लेकिन बसों के संचालन का अवसर निजी उद्यमियों को दीजिए। एक वक़्त था जब शायद निजी ऑपरेटर सक्षम नहीं थे। आज़ादी के बाद जब आपको लगा कि सरकार को अपनी तरफ़ से बैसाखी लगानी है, तब लगा दी, अब बैसाखी का समय जा चुका है। हमारे देश में काफी समस्‍याएं हैं, लेकिन शायद बस चलाने के लिए सरकारी मदद की जरूरत नहीं है।

दिल्ली के कश्मीरी गेट टर्मिनल पर प्रति बस 500 रुपये का प्रवेश शुल्‍क है। कमेटी ने एक ऑपरेटर का उदाहरण दिया है, जिसे प्रतिदिन करीब 5 लाख रुपये का शुल्‍क देना पड़ता है। टर्मिनल के अंदर दुकानों से खरीदारी और अन्‍य सेवाओं का उपयोग भी यात्री करते हैं, जो अतिरिक्‍त आय है। कश्‍मीरी गेट यह दर्शाता है कि इस प्रकार टर्मिनल के संचालन से सभी पक्षों का लाभ है।

सुझाव यह नहीं है कि बस टर्मिनल का निजीकरण कर दीजिए। आप जैसे एयरपोर्ट चलाते हैं, वैसे ही बस टर्मिनल भी चलाइए।

अगली बात यह कि टूरिस्ट परमिट क्या होता है? क्या बसों में सफर करने वाले सभी यात्री टूरिस्ट होते हैं? लोग अपने व्यवसाय के लिए और परिवार के साथ भी यात्रा करते हैं। कमेटी का एक सुझाव यह है कि बसों को ऑल इंडिया परमिट दीजिए। हमें यह जानकारी जरूर होनी चाहिए कि बसों में कितने टूरिस्‍ट सफर कर रहे हैं, लेकिन यह पर्यटन विभाग का विषय है। बसों के सुगम और सुरक्षित संचालन के लिए यह जानना ज्‍यादा जरूरी है कि बसें कहां से कहां तक चल रही हैं और यात्रियों में बुजुर्ग, महिलाओं, पुरुषों और बच्‍चों की संख्‍या कितनी है।

इंडस्ट्री सूत्रों का अनुमान है कि रोज़ाना 5 से 6 करोड़ लोग इंटरसिटी बस से सफर करते हैं। कमेटी के खुद के सूत्रों ने 2019 में 3 करोड़ बस के और 2.3 करोड़ यात्री रेलवे के दिखाए। देश में 4.4 लाख बस हैं, यह पता है, लेकिन हमारे पास कोई डेटा ही नहीं है यह बताने के लिए कि कितने सवारी हैं? जिस तरह हवाई जहाज और रेल यात्रियों का डाटा हमारे पास उपलब्‍ध रहता है, उसी तरह बस यात्रियों की जानकारी भी होनी चाहिए। डिजिटल इंडिया में हम ऑनलाइन टिकट बुकिंग के आदी हैं और सारी बसों में जीपीएस ट्रैकर भी हैं। हमारे पास पर्याप्‍त साधन हैं और हम इसे आसानी से कार्यान्वित कर सकते हैं। जरूरत है इच्‍छाशक्ति की।